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Thursday, September 5, 2024

Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 राजस्थान की रजत बूँदें, प्रश्न-अभ्यास, PPT

 

Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 राजस्थान की रजत बूँदें -अनुपम मिश्र 


पाठ का सुंदर, सुबोध, चित्रात्मक पीपीटी PPT DOWNLOAD करने के लिए यहाँ क्लिक करें 

पाठ का चित्रात्मक पीपीटी PPT 


पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न. 1.राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं की गहराई और व्यास में क्या अंतर होता है?

उत्तर: राजस्थान में रेत अथाह है। वर्षा का पानी रेत में समा जाता है, जिससे नीचे की सतह पर नमी फैल जाती है। यह नमी खड़िया मिट्टी की परत के ऊपर तक रहती है। इस नमी को पानी के रूप में बदलने के लिए चार-पाँच हाथ के व्यास की जगह को तीस से साठ हाथ की गहराई तक खोदा जाता है। खुदाई के साथ-साथ चिनाई भी की जाती है। इस चिनाई के बाद खड़िया की पट्टी पर रिस-रिस कर पानी एकत्र हो जाता है। इसी तंग गहरी जगह को कुंई कहा जाता है। यह कुएँ का स्त्रीलिंग रूप है। यह कुएँ से केवल व्यास में छोटी होती है, परंतु गहराई में लगभग समान होती है। आम कुएँ का व्यास पंद्रह से बीस हाथ का होता है, परंतु कुंई का व्यास चार या पाँच हाथ होता है।

प्रश्न. 2. दिनोदिन बढ़ती पानी की समस्या से निपटने में यह पाठ आपकी कैसे मदद कर सकता है तथा देश के अन्य राज्यों में इसके लिए क्या उपाय हो रहे हैं? जानें और लिखें।
उत्तर: मनुष्य ने प्रकृति का जैसा दोहन किया है, उसी का अंजाम आज मनुष्य भुगत रहा है। जंगलों की कटाई भूमि का जल स्तर घट गया है और वर्षा, सरदी, गरमी आदि सभी अनिश्चित हो गए हैं। इसी प्राकृतिक परिवर्तन से मनुष्य में अब कुछ चेतना आई है। अब वह जल संरक्षण के उपाय खोजने लगा है। इस उपाय खोजने की प्रक्रिया में राजस्थान सबसे आगे है, क्योंकि वहाँ जल का पहले से ही अभाव था। इस पाठ से हमें जल की एक-एक बूंद का महत्त्व समझने में मदद मिलती है। पेय जल आपूर्ति के कठिन, पारंपरिक, समझदारीपूर्ण तरीकों का पता चलता है।

अब हमारे देश में वर्षा के पानी को एकत्र करके उसे साफ़ करके प्रयोग में लाने के उपाय और व्यवस्था सभी जगह चल रही है। पेय जल आपूर्ति के लिए नदियों की सफ़ाई के अभियान चलाए जा रहे हैं। पुराने जल संसाधनों को फिर से प्रयोग में लाने पर बल दिया जा रहा है। राजस्थान के तिलोनिया गाँव में पक्के तालाबों में वर्षा का जल एकत्र करके जल आपूर्ति के साथ-साथ बिजली तक पैदा की जा रही है जो एक मार्गदर्शक कदम है। कुंईनुमा तकनीक से पानी सुरक्षित रहता है।

प्रश्न. 3. चेजारो के साथ गाँव समाज के व्यवहार में पहले की तुलना में आज क्या फ़र्क आया है, पाठ के आधार पर बताइए?

उत्तर: चेजारो’ अर्थात् चिनाई करने वाले। कुंई के निर्माण में ये लोग दक्ष होते हैं। राजस्थान में पहले इन लोगों का विशेष सम्मान था। काम के समय उनका विशेष ध्यान रखा जाता था। कुंई खुदने पर चेलवांजी को विदाई के समय तरह-तरह की भेंट दी जाती थी। इसके बाद भी उनका संबंध गाँव से जुड़ा रहता था। प्रथा के अनुसार कुंई खोदने वालों को वर्ष भर सम्मानित किया जाता था। उन्हें तीज-त्योहारों में, विवाह जैसे मंगल अवसरों पर नेग, भेंट दी जाती थी। फसल आने पर उनके लिए अलग से अनाज निकाला जाता था। अब स्थिति बदल गई है, आज उनका सम्मान कम हो गया है। अब सिर्फ मजदूरी देकर काम करवाया जाता है।

प्रश्न. 4. निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुंइयों पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?

उत्तर: जल और विशेष रूप में पेय जल सभी के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। कुंई का जल और रेगिस्तान की गरमी की तुलना करें तो जल अमृत से बढ़कर है। ऐसे में अपनी-अपनी व्यक्तिगत कुंई बना लेना और मनमाने ढंग से उसका प्रयोग करना समाज के अंकुश से परे हो जाएगा। अतः सार्वजनिक स्थान पर बनी व्यक्तिगत कुंई पर और उसके प्रयोग पर समाज का अंकुश रहता है। यह भी एक तथ्य है कि खड़िया की पट्टी वाले स्थान पर ही कुंई बनाई जाती हैं और इसीलिए एक ही स्थान पर अनेक कुंई बनाई जाती हैं। यदि वहाँ हरेक अपनी कुंई बनाएगा तो क्षेत्र की नमी बँट जाएगी जिससे कुंई की पानी एकत्र करने की क्षमता पर फर्क पड़ेगा।

प्रश्न. 5. कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करें पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी।

त्तर: पालरपानी-यह पानी का वह रूप है जो सीधे बरसात से मिलता है। यह धरातल पर बहता है और इसे नदी, तालाब आदि में रोका जाता है। इस पानी का वाष्पीकरण जल्दी होता है। काफी पानी जमीन के अंदर चला जाता है। पातालपानी-जो पानी भूमि में जाकर भूजल में मिल जाता है, उसे पाताल पानी कहते हैं। इसे कुओं, पंपों, ट्यूबबेलों आदि के द्वारा निकाला जाता है। रेजाणीपानी-यह पानी धरातल से नीचे उतरता है, परंतु पाताल में नहीं मिलता है। यह पालरपानी और पातालपानी के बीच का है। वर्षा की मात्रा नापने में इंच या सेंटीमीटर नहीं, बल्कि ‘रेजा’ शब्द का उपयोग होता है। रेज का माप धरातल में समाई वर्षा को नापता है। रेजाणी पानी खड़िया पट्टी के कारण पाताली पानी से अलग बना रहता है तथा इसे कुंइयों के माध्यम से इकट्ठा किया जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न. 1. कुंई का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर: कुंई राजस्थान के रेगिस्तान में मीठे पानी से पोषण करनेवाली एक कलात्मक कृति है। इसे बनाने में वहाँ के लोगों का पीढ़ी दर पीढ़ी का अनोखा अनुभव लगा है और एक समूचा शास्त्र विकसित किया गया है। राजस्थान में जल की कमी तो सदा से ही है। इसे पूरा करने के लिए कुएँ, तालाब, बावड़ी आदि का प्रयोग होता है। कुंई मीठे पानी का संग्रह स्थल है। मरुभूमि में रेत का विस्तार और गहराई अथाह है। यहाँ वर्षा अधिक मात्रा में भी हो तो भी शीघ्रता से भूमि में समा जाती है। पर कहीं-कहीं मरुभूमि में रेत की सतह के नीचे प्रायः दस-पंद्रह से पचास-साठ हाथ नीचे खड़िया पत्थर की एक पट्टी चलती है। यह पट्टी जहाँ भी है वहाँ वर्षा का जल भू-तल के जल में नहीं मिल पाता, यह पट्टी उसे रोकती है।

यह रुका हुआ पानी संग्रह कर प्रयोग में लाने की विधि है-कुंई इसे छोटे व्यास में गहरी खुदाई करके बनाया जाता है। इसकी खुदाई एक छोटे उपकरण बसौली से की जाती है। खुदाई के साथ-साथ चिनाई का काम भी चलता रहता है। चिनाई ईंट-पत्थर, खींप की रस्सी और लकड़ी के लट्ठों से की जाती है। यह सब कार्य एक कुशल कारीगर चेलवांजी या चेजारो द्वारा किया जाता है। ये पीढ़ियों के अनुभव से अपने काम में माहिर होते हैं। समाज में इनका मान होता है। कुंई में खड़िया पट्टी पर रेत के नीचे इकट्ठा हुआ जल बूंद-बूंद करके रिस-रिसकर एकत्र होता जाता है। इसे प्रतिदिन दिन में एक बार निकाला जाता है। ऐसा लगता है प्रतिदिन सोने का एक अंडा देनेवाली मुरगी की कहानी कुंई पर भी लागू होती है। कुंई निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में होती हैं। उन पर ग्राम-समाज का अंकुश लगा रहता है।

प्रश्न. 2. राजस्थान में कुंई क्यों बनाई जाती हैं? कुंई से जल लेने की प्रक्रिया बताइए।
उत्तर: राजस्थान में थार का रेगिस्तान है जहाँ जल का अभाव है। नदी-नहर आदि तो स्वप्न की बात है। तालाबों और बावड़ियों के जल से नहाना, धोना और पशुधन की रक्षा करने का काम किया जाता है। कुएँ बनाए भी जाते हैं तो एक तो उनका जल स्तर बहुत नीचे होता है और दूसरा उनसे प्राप्त जल खारा (नमकीन) होता है। अतः पेय जल आपूर्ति और भोजन बनाने के लिए कुंई के पानी का प्रयोग किया जाता है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजस्थान में कुंई बनाई जाती जब कुंई तैयार हो जाती है तो रेत में से रिस-रिसकर जल की बूंदें कुंई में टपकने लगती हैं और कुंई में जल इकट्ठा होने लगता है। इस जल को निकालने के लिए गुलेल की आकृति की लकड़ी लगाई जाती है। उसके बीच में फेरडी या घिरणी लगाकर रस्सी से चमड़े की थैली बाँधकर जल निकाला जाता है। आजकल ट्रक के टॉयर की भी चड़सी बना ली। जाती है। जल निकालने का काम केवल दिन में एक बार सुबह-सुबह किया जाता है। उसके बाद कुंई को ढक दिया जाता।

प्रश्न. 3. कुंई और कुएँ में क्या अंतर है?
उत्तर: कुंई का व्यास संकरा और गहराई कम होती है। इसकी तुलना में कुएँ का व्यास और गहराई कई गुना अधिक होती है। कुआँ भू-जल को पाने के लिए बनाया जाता है पर कुंई वर्षा के जल को बड़े ही विचित्र ढंग से समेटने का साधन है। कुंई बनाने के लिए खड़िया पट्टी का होना अति आवश्यक है जो केवल भू-गर्भ जानकारी वाले लोग ही बताते हैं, जबकि कुएँ के लिए यह जरूरी नहीं है। कुंई मीठे पानी का संग्रह स्थल है, जबकि कुआँ प्रायः खारे पानी का स्रोत होता है।

प्रश्न. 4. कुंई का मुँह छोटा रखने के क्या कारण हैं? उत्तर- कुंई का मुँह छोटा रखने के निम्नलिखित तीन बड़े कारण हैं

1.    रेत में जमा पानी कुंई में बहुत धीरे-धीरे रिसता है। अतः मुँह छोटा हो तभी प्रतिदिन जल स्तर पानी भरने लायक बन पाता है।

2.    बड़े व्यास से धूप और गरमी में पानी के भाप बनकर उड़ जाने का खतरा बना रहता है।

3.    कुंई की स्वच्छता और सुरक्षा के लिए उसे ढककर रखना जरूरी है; मुँह छोटा होने से यह कार्य आसानी से किया जा सकता है।

प्रश्न. 5. खड़िया पट्टी का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: राजस्थान की मरुभूमि में रजकणों के नीचे खूब गहराई में खड़िया पत्थर की परत पाई जाती है। यह परत काफ़ी कठोर होती है। इसी परत के कारण रजकणों द्वारा सोख लिया गया जल नीचे भूल-तल के जल में नहीं मिलता और उससे ऊपर रह जाता है। रेत के नीचे सब जगह खड़िया की पट्टी नहीं है। इसलिए कुंई भी सारे राजस्थान में नहीं मिलतीं। चुरू, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के कई क्षेत्रों में यह पट्टी चलती है और इसी कारण वहाँ गाँव-गाँव में कुंइयाँ हैं। जैसलमेर जिले के एक गाँव खडेरों की ढाणी में तो एक सौ बीस कुइयाँ थीं। लोग इस क्षेत्र को छह-बीसी (छह गुणा बीस) कहते हैं। इस पट्टी को पार भी कहा जाता है। जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई गाँव पार के कारण ही आबाद हैं। अलग-अलग जगहों पर खड़िया पट्टी के अलग-अलग नाम हैं। कहीं चह चारोली है तो कहीं धाधड़ों, धड़धड़ो, कहीं पर बिटू से बल्लियों के नाम से भी जानी जाती है। कहीं इस पट्टी को ‘खड़ी’ भी कहते हैं। इसी खड़ी के बल पर खारे पानी के बीच मीठा पानी देता हुई कुंई खड़ी रहती है।


Tuesday, July 9, 2024

कबीर CLASS XI हम तौ एक एक करि जांनां

 

Class 11 Hindi हम तौ एक एक करि जांनां



कवि परिचय  कबीर 

जीवन परिचय: कबीरदास का नाम संत कवियों में सर्वोपरि है। इनके जन्म और मृत्यु के बारे में अनेक किवदंतियाँ प्रचलित हैं। इनका जन्म 1398 ई में वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ। कबीरदास ने स्वयं को काशी का जुलाहा कहा है। इनके विधिवत् साक्षर होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। ये स्वयं कहते हैं- “ससि कागद छुयो नहि कलम गहि नहि हाथ।”
इन्होंने देशाटन और सत्संग से ज्ञान प्राप्त किया। किताबी ज्ञान के स्थान पर आँखों देखे सत्य और अनुभव को प्रमुखता दी-‘‘में कहता हों आँखन देखी, तू कहता कागद की लखी। इनका देहावसान 1518 ई में बस्ती के निकट मगहर में हुआ।

रचनाएँ: कबीरदास के पदों का संग्रह बीजक नामक पुस्तक है, जिसमें साखी. सबद एवं रमैनी संकलित हैं।

साहित्यिक परिचय: कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। इन पर नाथों. सिद्धों और सूफी संतों की बातों का प्रभाव है। वे कमकांड और वेद-विचार के विरोधी थे तथा जाति-भेद, वर्ण-भेद और संप्रदाय-भेद के स्थान पर प्रेम, सद्भाव और समानता का समर्थन करते थे: कबीर घुमक्कड़ थे। इसलिए इनकी भाषा में उत्तर भारत की अनेक बोलियों के शब्द पाए जाते हैं। वे अपनी बात को साफ एवं दो टूक शब्दों में प्रभावी ढंग से कह देने के हिमायती थे ‘‘बन पड़ तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरेरा देकर।

पाठ का सारांश

पहले पद में कबीर ने परमात्मा को सृष्टि के कण-कण में देखा है, ज्योति रूप में स्वीकारा है तथा उसकी व्याप्ति चराचर संसार में दिखाई है। इसी व्याप्ति को अद्वैत सत्ता के रूप में देखते हुए विभिन्न उदाहरणों के द्वारा रचनात्मक अभिव्यक्ति दी है। कबीरदास ने आत्मा और परमात्मा को एक रूप में ही देखा है। संसार के लोग अज्ञानवश इन्हें अलग-अलग मानते हैं। कवि पानी, पवन, प्रकाश आदि के उदाहरण देकर उन्हें एक जैसा बताता है। बाढ़ी लकड़ी को काटता है, परंतु आग को कोई नहीं काट सकता। परमात्मा सभी के हदय में विद्यमान है। माया के कारण इसमें अंतर दिखाई देता है।

व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न 

हम तौ एक करि जांनानं जांनां 
दोइ कहैं तिनहीं कौं  दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां।

एकै पवन एक ही पानीं एकै ज्योति समांनां।
एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कोंहरा सांनां।

जैसे बढ़ी काष्ट ही काटे अगिनि न काटे कोई।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।
माया देखि के जगत लुभांनां कह रे नर गरबांनां
निरभै भया कछू नहि ब्यापै कहैं कबीर दिवांनां।

 

शब्दार्थ

एक-परमात्मा, एक। दोई-दो। तिनहीं-उनको। दोजग-नरक। नाहिंन-नहीं। एकै-एक। पवन-हवा। जोति-प्रकाश। समाना-व्याप्त। खाक-मिट्टी। गढ़े-रचे हुए। भांड़े-बर्तन। कोहरा-कुम्हार। सांनां-एक साथ मिलकर। बाढ़ी-बढ़ई। काष्ट-लकड़ी। अगिनि-आग। घटि-घड़ा, हृदय। अंतरि-भीतर, अंदर। व्यापक-विस्तृत। धरे-रखे। सरूपै-स्वरूप। सोई-वही। जगत-संसार। लुभाना-मोहित होना। नर-मनुष्य। गरबानां-गर्व करना। निरभै-निडरा भया-हुआ। दिवानां-बैरागी।

व्याख्या-कबीरदास कहते हैं कि हमने तो जान लिया है कि ईश्वर एक ही है। इस तरह से मैंने ईश्वर के अद्वैत रूप को पहचान लिया है। हालाँकि कुछ लोग ईश्वर को अलग-अलग बताते हैं; उनके लिए नरक की स्थिति है, क्योंकि वे वास्तविकता को नहीं पहचान पाते। वे आत्मा और परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं। कवि ईश्वर की अद्वैतता का प्रमाण देते हुए कहता है कि संसार में एक जैसी हवा बहती है, एक जैसा पानी है तथा एक ही प्रकाश सबमें समाया हुआ है। कुम्हार भी एक ही तरह की मिट्टी से सब बर्तन बनाता है, भले ही बर्तनों का आकार-प्रकार अलग-अलग हो। बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है, परंतु आग को नहीं काट सकता। इसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है, परंतु उसमें व्याप्त आत्मा सदैव रहती है। परमात्मा हरेक के हृदय में समाया हुआ है भले ही उसने कोई भी रूप धारण किया हो। यह संसार माया के जाल में फैसा हुआ है। और वही संसार को लुभाता है। इसलिए मनुष्य को किसी भी बात को लेकर घमंड नहीं करना चाहिए। प्रस्तुत पद के अंत में कबीर दास कहते हैं कि जब मनुष्य निर्भय हो जाता है तो उसे कुछ नहीं सताता। कबीर भी अब निर्भय हो गया है तथा ईश्वर का दीवाना हो गया है।

विशेष-

1. कबीर ने आत्मा और परमात्मा को एक बताया है।
2. उन्होंने माया-मोह व गर्व की व्यर्थता पर प्रकाश डाला है।
3. ‘एक-एक’ में यमक अलंकार है।
4. ‘खाक’ और ‘कोहरा’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।
5. अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
6. सधुक्कड़ी भाषा है।
7. उदाहरण अलंकार है।
8. पद में गेयता व संगीतात्मकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. कबीरदासजी किस सिद्धांत को मानते थे- अ‌द्वैतवाद के

2. "कबीर के पद में किस भाषा का प्रयोग किया गया हैं सधुक्कडी भाषा

3. कबीरदासजी किसके उपासक थे निर्गुण, सर्वव्यापक, अविनाशी, निराकार परब्रह्म के

4. कबीरदासजी के अनुसार, किसकी सत्ता इस पूरी सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है - ईश्वर की

5. कुम्हार कितने प्रकार की मिट्टी को मिलाकर बर्तनों का निर्माण करता है - एक ही प्रकार

6. "एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कालेहरा सांनां", इस पंक्ति में "कोंहरा " शब्द का क्या अर्थ हैं - कुम्हार

7. संत कबीरदासजी ने ईश्वर के कितने स्वरूपों को जाना है केवल एक स्वरूप को

8. कबीरदासजी ने किसको सिर्फ एक माना है ईश्वर को

9. कबीरदासजी के अनुसार, ईश्वर कहां-कहां पर विद्यमान है- सृष्टि के कण-कण में 10. कबीरदासजी ने प्रकृति के किन रूपों को एकाकार करना चाहा - पानी और हवा को

11. कबीरदासजी के अनुसार, जो लोग ईश्वर को अलग-अलग मानते हैं, वो किस जगह के अधिकारी हैं - नर्क के

12. "दोजग का क्या अर्थ हैं नर्क

13. "तदवीर का क्या अर्थ हैं उपाय

14. "हम तौ एक एक करि जांना", पद में ईश्वर के प्रतीक के रूप में किसे माना है - कुम्हार को

15. "हम तौ एक एक करि जांनां में कौन सा अलंकार है यमक अलंकार (एक-एक, दोनों के अलग-अलग अर्थ हैं)

16. मानव शरीर का निर्माण कितने तत्वों से हुआ है पांच

17. "जैसे बाढी काष्ट ही काटै" में "बाढी का क्या अर्थ हैं बढ़ई

18. बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है लेकिन क्या नहीं काट सकता है उसके भीतर की आग को

19. "काष्ट ही काटै, में कौन सा अलंकार है अनुप्रास अलंकार

20. "सरूपै सोई" में कौन सा अलंकार है-अनुप्रास अलंकार

21. "कहै कबीर" में कौन सा अलंकार है-अनुप्रास अलंकार

22. सती देखत जग बौराना" पद में कबीरदासजी का स्वर कैसा है- विद्रोह का

23. कैसे व्यक्ति का संसार के लोग जल्दी विश्वास कर लेते हैं झूठे

24. सत्यवादी लोगों के साथ संसार के लोग कैसा व्यवहार करते हैं उन्हें मारते हैं

25. इस्लाम धर्म की धार्मिक पुस्तक का क्या नाम है कुरान शरीफ

26. "सतों देखत जग बौराना" में बौराना क्या है बावला होना या पागल होना

27. "पतियाना", शब्द का क्या अर्थ हैं विश्वास करना

28. "आसन मारि डिंभ धरि बैठे" में "डिंभ धरि क्या है आडंबर करना

29. "गरबांना शब्द का क्या अर्थ हैं अहंकार

30. धर्म के नाम पर कौन आपस में लड़ मर रहे हैं हिंदू और मुसलमान

31. कबीर ने किसका घोर विरोध किया है बाह्य आडंबरों का

32. माया जाल में फंसे गुरु और शिष्य को अंत में क्या करना पड़ता है पछताना

33. मुरीद शब्द का क्या अर्थ हैं शिष्य या अनुगामी

34. "पीर औलिया से कबीरदासजी का क्या आशय हैं-धर्मगुरु संत ज्ञानी

35. "पीपर पाथर पूजन लागे" में कौन सा अलंकार है अनुप्रास अलंकार

36. घर-घर मंत्र देने वाले लोगों को किस चीज का अभिमान है ज्ञान का

37. किसे देखकर सारा संसार लालच में पड़ जाता है माया को 38. कबीरदासजी स्वयं को क्या मानते है दीवाना मस्ताना

39. संत कबीर ने जगत को कैसा बताया है बौराना (वावला)

40. कबीर जी ने सत्य को जानने के लिए क्या आवश्यक बताया है आत्मज्ञान

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

पद के साथ

प्रश्न 1 कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है। इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर-कबीर ने एक ही ईश्वर के समर्थन में अनेक तर्क दिए हैं, जो निम्नलिखित हैं

1.     संसार में सब जगह एक ही पवन व जल है।

2.     सभी में एक ही ईश्वरीय ज्योति है।

3.     एक ही मिट्टी से सभी बर्तनों का निर्माण होता है।

4.     एक ही परमात्मा का अस्तित्व सभी प्राणों में है।

5.     प्रत्येक कण में ईश्वर है।

6.     दुनिया के हर जीव में ईश्वर व्याप्त है।

प्रश्न 2 मानव शरीर का निर्माण किन पंच तत्वों से हुआ है?
उत्तर-मानव शरीर का निर्माण निम्नलिखित पाँच तत्वों से हुआ है-

1.     अग्नि

2.     वायु

3.     पानी

4.     मिट्टी

5.     आकाश

प्रश्न 3: जैसे बाढ़ी काष्ट ही कार्ट अगिनि न कार्ट कोई।
सब छटि अंतरि तूही व्यापक धरे सरूपै सोई।
इसके आधार पर बताइए कि कबीर की वृष्टि में ईश्वर का क्या स्वरूप है?
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियों का अर्थ है कि बढ़ई काठ (लकड़ी) को काट सकता है, पर आग को नहीं काट सकता, इसी प्रकार ईश्वर घट-घट में व्याप्त है अर्थात् कबीर कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार आग को सीमा में नहीं बाँधा जा सकता और न ही आरी से काटा जा सकता है, उसी प्रकार परमात्मा हम सभी के भीतर व्याप्त है। यहाँ कबीर का आध्यात्मिक पक्ष मुखर हो रहा है कि आत्मा (ईश्वर का रूप) अजर-अमर, सर्वव्यापक है। आत्मा को न मारा जा सकता है, न यह जन्म लेती है, इसे अग्नि जला नहीं सकती और पानी भिगो नहीं सकता। यह सर्वत्र व्याप्त है।

प्रश्न 4 कबीर ने अपने को दीवाना क्यों कहा है?
उत्तर- यहाँ ‘दीवाना’ का अर्थ है-पागल। कबीरदास ने परमात्मा का सच्चा रूप पा लिया है। वे उसकी भक्ति में लीन हैं, जबकि संसार बाहय आडंबरों में उलझकर ईश्वर को खोज रहा है। अत: कबीर की भक्ति आम विचारधारा से अलग है इसलिए वह स्वयं को दीवाना कहता है।

Friday, February 23, 2024

डायरी लेखन DIARY LEKHAN

डायरी लेखन DIARY LEKHAN CLASS XI

प्रश्न 1. डायरी किसे कहते हैं ?

उत्तर-डायरी एक ऐसी नोट बुक होती है, जिसके पृष्ठों पर वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिनों की तिथियाँ क्रम से लिखी होती हैं। प्रत्येक तिथि के बाद पृष्ठ को खाली छोड़ दिया जाता है। डायरी को दैनिकी, दैनंदिनी, रोज़नामचा, रोजनिशि, वासरी, वासरिया भी कहते हैं। यह मोटे गत्ते की सुंदर जिल्द से सजी हुई होती है। कुछ डायरियाँ प्लास्टिक के रंग-बिरंगे कवरों से सजाई जाती हैं। डायरी विभिन्न आकारों में मिलती है। इनमें टेबल डायरी, पुस्तकाकार डायरी, पॉकेट डायरी प्रमुख हैं। नए वर्ष के आगमन के साथ ही विभिन्न आकार-प्रकार की डायरियाँ भी बाज़ार में मिलने लगती हैं। डायरी लिखने वाले हर व्यक्ति की यही इच्छा होती है कि नए वर्ष के पहले दिन उसके पास नई डायरी हो।


प्रश्न 2. डायरी का क्या उपयोग है ?

उत्तर-डायरी के प्रत्येक पृष्ठ पर एक तिथि होती है तथा शेष पृष्ठ खाली होता है। इस खाली पृष्ठ का उपयोग उस तिथि विशेष से संबंधित सूचनाओं अथवा अपनी निजी बातों को लिखने के लिए किया जाता है। किसी विशेष तिथि पर यदि हमें कोई विशेष कार्य करना है अथवा कहीं जाना है तो उससे संबंधित सूचना पहले से ही उस तिथि वाले पृष्ठ पर लिख दी जाती है। इससे उक्त तिथि के आने पर हमें किए जाने वाले कार्य याद आ जाते हैं। हमारे दिन-प्रतिदिन के अनुभवों को भी हम उस तिथि के पृष्ठ पर लिख कर अपने अनुभवों को सुरक्षित रख सकते हैं। कुछ लोग अपने दैनिक आय-व्यय का विवरण, धोबी-दूध का हिसाब, बच्चों की शरारतों आदि को भी डायरी में लिखते हैं


प्रश्न 3. डायरी-लेखन क्या है ? कुछ प्रसिद्ध डायरियों और डायरी लेखकों के नाम भी बताइए।


उत्तर-अत्यंत निजी स्तर पर घटित घटनाओं और उससे संबंधित बौद्धिक तथा भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का लेखा-जोखा डायरी कहलाता है। हमारे जीवन में प्रतिदिन अनेक घटनाएं घटती हैं। हम अनेक गतिविधियों और विचारों से भी गुज़रते हैं। दैनिक जीवन में हम जिन घटनाओं, विचारों और गतिविधियों से निरंतर गुज़रते हैं, उन्हें डायरी के पृष्ठों पर शब्दबद्ध कर लेना ही डायरी-लेखन है। प्रसिद्ध डायरियों और उनके लेखकों के नाम निम्नलिखित हैं-

(i) एक साहित्यिक की डायरी-गजानन माधव मुक्तिबोध।

(ii) पैरों में पंख बाँध कर-रामवृक्ष बेनीपुरी।

(iii) रूस में पच्चीस मास-राहुल सांकृत्यायन।

(iv) सुदूर दक्षिणपूर्व-सेठ गोविंददास।

(v) द डायरी ऑफ अ यंग गर्ल-ऐनी फ्रैंक।

(vi) हरी घाटी-डॉ० रघुवंश।

(vi) हरा घाटा-डॉ० रघुवंश।

 

प्रश्न 4. डायरी-लेखन अपने अंतरंग के साथ साक्षात्कार कैसे है ?

उत्तर-डायरी में हम अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं, अनुभवों आदि का विवरण प्रत्येक तिथि के अनुसार लिखते रहते हैं। हम अपनी डायरी में उन बातों को भी लिख देते हैं, जिन्हें हम किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं बता सकते। इस प्रकार हम डायरी पर लिखते समय अपनी बातें स्वयं को ही बताते चलते हैं। इससे हमारा अपने आप से ही संवाद स्थापित हो जाता है। इससे हमें हमारी अच्छाइयों और बुराइयों का ज्ञान हो जाता है। हम स्वयं को अच्छी प्रकार से समझ पाते हैं तथा जहाँ कमियाँ हैं उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। हमें जब भी आवश्यकता होती है हम डायरी के पिछले पृष्ठों को पढ़कर अपने अतीत को स्मरण कर सकते हैं। इस प्रकार डायरी-लेखन हमें अपने अंतरंग के साथ साक्षात्कार करने का अवसर प्रदान करता है ।


प्रश्न 5. डायरी एक व्यक्तिगत दस्तावेज़ कैसे है ?

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उत्तर-डायरी में हम अपने जीवन के कुछ विशेष क्षणों में घटित अनुभवों, विचारों, घटनाओं, मुलाकातों आदि का विवरण लिखते हैं। यदि हम इन विवरणों को उसी तिथि विशेष पर नहीं लिखते तो संभव है कि हम उस विशेष क्षण में घटित अनुभव को भूल जाएँगे और फिर कभी उसे स्मरण नहीं कर पाएंगे। डायरी में लिखित विवरण हमें भूलने से बचाते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम किसी पर्यटन स्थल पर जाते हैं और वहाँ पर अनेक स्थलों को देखते हैं। यदि हम प्रत्येक स्थल की यात्रा का विवरण उसी दिन अपनी डायरी में लिख लेते हैं तो हम अपने अनुभव को पूर्ण रूप से सुरक्षित रख सकते हैं तथा अवसर मिलने पर इसे पढ़कर उस यात्रा का फिर से पूरा आनंद उठा सकते हैं। यदि हम यात्रा से लौट कर सारा विवरण लिखना चाहें तो संभव नहीं हो पाएगा। हम अनेक विवरण लिखना छोड़ जाएंगे। डायरी से जब हम अपने विगत को पढ़ते  हैं तो यह हमारा एक व्यक्तिगत दस्तावेज़ बन जाता है।


प्रश्न 6. डायरी लिखते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?


उत्तर-डायरी लिखते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है

(i) डायरी सदा किसी नोटबुक अथवा पिछले साल की डायरी में लिखी जानी चाहिए। इसका कारण यह है कि यदि हम वर्तमान वर्ष की डायरी तिथि अनुसार लिखेंगे तो उसमें एक दिन के लिए दी गई जगह कम या अधिक हो सकती है। इससे हमें भावों की अभिव्यक्ति को उसी सीमा में ही बाँधना पड़ेगा ।

(ii) डायरी लिखते समय स्वयं तय करें कि आप क्या सोचते हैं और स्वयं को क्या कहना चाहते हैं। दिन भर की घटनाओं में से मुख्य घटना अथवा गतिविधि का चयन करने के बाद ही उसे शब्दबद्ध करें।


(iii) डायरी अत्यंत निजी वस्तु है। इसे सदा यही मानकर लिखें कि उसके पाठक भी आप स्वयं हैं और लेखक भी।इससे भाषा-शैली स्वाभाविक बनी रहती है।


(iv) डायरी में भाषा की शुद्धता और शैली की विशेषता पर ध्यान नहीं देना चाहिए। मन के भावों को स्वाभाविक वेग से जिस रूप में भी प्रस्तुत किया जाए, वही डायरी की शैली होती है।


(v) डायरी समकालीन इतिहास होता है। अतः डायरी लिखते समय हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। डायरी में डायरी लेखक के भावों और तत्कालीन समाज को स्पष्ट देखा जा सकता है।


प्रश्न 7. डायरी कैसे और किस में लिखनी चाहिए ?

उत्तर-डायरी सोने से पूर्व दिनभर की गतिविधियों को स्मरण करते हुए लिखनी चाहिए। डायरी किसी नोट बुक अथवा पुरानी डायरी में लिखने वाले दिन की तिथि डाल कर लिखनी चाहिए। नोट बुक अथवा पुराने साल की डायरी में डायरी लिखना इसलिए उचित होता है क्योंकि कई बार नए साल की डायरी की तिथियों में दिया गया खाली पृष्ठ हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कम लगता है अथवा कभी हम दो-चार पंक्तियों में ही अपनी बात लिखना चाहते हैं। इसलिए नए साल की डायरी के पृष्ठों की तिथियों तक स्वयं को सीमित रखने के स्थान पर यदि हम किसी नोटबुक अथवा पुराने साल की डायरी में अपनी सुविधा के अनुसार तिथियाँ डालकर अपने विचारों और अनुभवों को लिपिबद्ध करेंगे तो हम स्वयं को खुलकर अभिव्यक्त कर सकते हैं

प्रश्न 8. डायरी-लेखन की भाषा-शैली कैसी होनी चाहिए ?

उत्तर-डायरी लिखते समय हमें सहज, व्यावहारिक तथा आडंबरविहीन भाषा-शैली का प्रयोग करना चाहिए। मानव एवं साहित्यिक भाषा-शैली के प्रयोग के मोह में हम डायरी में अपनी भावनाओं को सहज रूप से व्यक्त नहीं कर सकते। डायरी में भावों को सर्वत्र सहजता से प्रकट होने का अवसर मिलना चाहिए। मन में उत्पन्न भाव अत्यंत सरलता से शब्दों में ढलते जाने चाहिए। डायरी-लेखन प्रत्येक अच्छी-बुरी बात को सहज रूप से लिखा जाता है। इसलिए इसमें भाषा-शैली के आडंबरपूर्ण होने का अवसर ही नहीं होता है। डायरी में आप अपनी बात जैसे चाहें और जिस ढंग से चाहें लिख सकते हैं। यही डायरी की भाषा-शैली की विशेषता है। डायरी की भाषा-शैली समस्त बंधनों से मुक्त होती


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